अंधा प्रकाश

जोरशोर से कही बात
सुनाई नहीं देती है
बहुत तीखी है
तेरी फुसफुसाहट

अंधा बना देता है
प्रकाश! अंधा प्रकाश!!
जो प्रकट है वह
दिखाई नहीं देता
जैसे कि कपट

➖ मैं तुम्हारे तिलस्म को
भीतर से जानता हूँ वामदेव
➖ यह भी कि उनके भीतर
कुछ है ही नहीं

तो कान आँख दोनो ही गये मनुआ भया उदास
अभी वक्त लगेगा लाइलाज नहीं यह जो है एहसास

'लूट लिया' या 'लुट गया'

‘लूट लिया’ या ‘लुट गया’ समय का सब से कारगर पदबंध और सक्रिय पदार्थ है। जिंदगी ईमान लेस होकर रह गई तो क्या कैश लेस और क्या लेस कैश!

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यह सच है कि मैंने झूठ को रचने की कोशिश में सच को नजदीक से देखने की तमीज हासिल की है। कई अगर-मगर हैं, डिमोनिटाइजेशन के सच और झूठ अपनी जगह। मुझे लगता है कि कैश लेस या कह लीजिये लेस कैश की प्रक्रिया का विरोध अंततः पिछली बार के कंप्यूटरीकरण के विरोध की तरह हो जायेगा। उस दौर के कंप्यूटरीकरण विरोध की सक्रियता में खुद मैं भी शामिल था। इस दौर में! आज, कंप्यूटर के बिना अपनी रचनात्मक सक्रियता को जारी रखने या विरोध की किसी सक्रियता में निष्क्रियतः भी शामिल होने की बात सोचना मुश्किल है, कष्टकर है। कैश लेस या कह लीजिये लेस कैश की प्रक्रिया के विरोध के तर्क को भारत के पिछड़े हिस्से के हवाले से समझा नहीं जा सकता। यह दुश्चक्र के भारी दबाव का वृहत्तर क्षेत्र बना रहा है। यदि सवाल हो यह कि लोग कैश लेस या लेस कैश क्यों हैं तो जबाव होगा क्योंकि पिछड़े हैं। यदि सवाल हो यह कि लोग पिछड़े क्यों हैं जबाव होगा क्योंकि कैश लेस या लेस कैश हैं! ऐसी ट्रेजडी है नीच! हाँ ट्रांजेक्शनल और इनफ्रास्ट्रक्चरल सिक्योरिटी का सवाल महत्त्वपूर्ण है। लेकिन वैसे भी एक्चुअल, रियल, लाइव सिक्योरिटी की स्थिति के बारे में स्थिति कम चिंताजनक नहीं है।

भारत की बहुत बड़ी आबादी तो वैसे भी कैश लेस या लेस कैश की जिंदगी बसर कर रही है! दो सौ से भी ज्यादा कीमत पर दाल खरीद सकते हैं, घरेलू काम में नियुक्त लोगों का दो पैसा नहीं बढ़ा सकते! कल की तुलना में आज ‘लूट लिया’ या ‘लुट गया’ समय का सब से कारगर पदबंध और सक्रिय पदार्थ है। जिंदगी ईमान लेस होकर रह गई तो क्या कैश लेस और क्या लेस कैश! ‘लूट लिया’ या ‘लुट गया’ समय का सब से कारगर पदबंध और सक्रिय पदार्थ है। जिंदगी ईमान लेस होकर रह गई तो क्या कैश लेस और क्या लेस कैश!  बाजार से गुजरे कल की तुलना में डेढ़ गुना या दो गुना कीमत पर सब्जी खरीद सकते हैं लेकिन बाजार से लौटते हुए रिक्शा वाले को दो पैसा अधिक दे नहीं सकते हैं! और दें भी कहाँ से! सरकारी कर्मचारियों के एकांश की बात छोड़ दीजिये देर-सबेर महँगाई भत्ता से कुछ क्षतिपूर्त्ति हो भी जाती है, लेकिन बड़े पैमाने पर कामगारों का दरमाहा सालों नहीं बढ़ता है। उनके लिए न कोई वेतन वृद्धि और न कोई जिंदा और जागरूक वेतन आयोग। कुशल स्किल्ड या अकुशल अनस्किल्ड कामगारों न्यूनतम मजूरी या मिनिमम वेज एक बार तय हुआ तो हो गया। ‘लूट लिया’ या ‘लुट गया’ समय का सब से कारगर पदबंध और सक्रिय पदार्थ है। जब जिंदगी ही ईमान लेस होकर रह गई तो क्या कैश लेस और क्या लेस कैश!  

मैजिक मेरी जान, लॉजिक नहीं

मैजिक मेरी जान, लॉजिक नहीं
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ये जो दुनिया है
मैजिक से चलती है
मैं लॉजिक की तलाश करता रहा

पड़पीड़न में जो मजा है वह ब्लैक मैजिक है
मुहब्बत में जो मजा है वह
पिंक मैजिक है
इलेक्शन लड़ने का मजा
लाल मैजिक है
बीमार के चेहरे पर रौनक
येलो मैजिक है

हर रंग में एक मैजिकहै
हर मैजिक में एक रंग है
नहीं नहीं यह कोई
सियासी बात नहीं

बस इतना कि
शब्दों का जादूगर
कवि नहीं होता
अब शब्दों में
कोई लॉजिक बचा नहीं

कवि करे तो क्या करे! कविता!
ओह मुहब्बत!
यह भी तो
मैजिक है मेरी जान, लॉजिक नहीं

वे दिन हवा हुए
कभी लॉजिक का भी अपना मैजिक था
मैजिक को लॉजिक की
जरूरत नहीं थी
जरूरत नहीं थी कि झूठ को
अमूमन किसी की जरूरत
नहीं होती

लेकिन मुझे तुम्हारी जरूरत है
अब लॉजिक हो कि मैजिक हो
मुझे तुम्हारी जरूरत है
कहूँ डेमोक्रेसी तो
खुलकर बिखर जायेंगे
बिखरी अलकें ज्यों तर्कजाल
बुरा मान जायेंगे
महा कवि जयशंकर प्रसाद

जोखिम उठाता हूँ कह देता हूँ डेमोक्रेसी
कोई लॉजिक नहीं, बस मैजिक

कोई नहीं

गजब कि जहालत मजे में है और जाहिल कोई नहीं
मुर्दा अरमान तेरे गलियारे में और कातिल कोई नहीं

देखो न मेरी जान

देखो न मेरी जान
मोह मुझे किस तरह हलकान कर रहा है
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ना जाने क्यों उन जगहों पर भटकता रहता है मन

जहाँ भी तुम्हारे होने की होती है संभावना, सघन
ये ख्याल बहुत परेशान करता रहा है कि बची होगी अभी भी वहाँ किसी-न-किसी रूप में
तुम्हारे होने की संभावना या कम-से-कम परछाई
कभी-कभी तो मैं अचंभे में पर जाता हूँ
अपनी काया में इतनी बड़ी तो न थी तुम
फिर इतनी बड़ी कैसे है तुम्हारी माया
माया तो माया उससे भी बड़ी छाया

समझदार कहते हैं कि वहाँ कुछ नहीं है
कुछ है तो बस गहन है अंधकार
तुम्हें लील जायेगा अंधकार
निकलो भागो वहाँ से,
जान बचाओ,
तुम पागल हो चुके हो

उनका कहना है जो
विरुद्ध नहीं विपरीत हैं

छाया की संभावनाओं की
तलाश में जो भी गया
वापस नहीं आया आज तक

वे कविता में विज्ञान खोजते हैं, विज्ञान के सत्य
मैं विज्ञान में कविता की संभावनाओं को टटोलता हूँ

उन्हें मालूम है क्रिया और प्रतिक्रिया का वैश्विक विज्ञान

वे संगठित हैं, शक्तिशाली हैं
शक्तिशाली हैं, इसलिए सत्य हैं और सुंदर भी
उनका सौंदर्य सब को मोह रहा है

यह मोह खतरनाक है
शक्तिशाली हैं उन्होंने तुम्हें छाया में
छाया को माया में, माया को मोह में बदल दिया है

ठठा रहे हैं जितनी शक्ति से
उतनी ही तेजी से मैं समा रहा

तुम में नहीं,
छाया में, माया में, मोह में
कैसे बचा जा सकता है
इस समय, कैसे
मोह से द्रोह! यह भयानक होगा

भयानक कि यह द्रोह
गार्हस्थिक मोह,
माया और छाया को
अगर पार कर सका तो
तुम तक जरूर पहुँच जायेगा   

भयानक कि तुम आखिरी संभावना हो
संभावना को खोने से बचने की युक्ति पर

देखो न मेरी जान
मोह मुझे किस तरह
हलकान कर रहा है
जैसे कि तुम डेमोक्रेसी हो
और मैं संविधान

 

बात और है

हूँ शोर में शामिल मगर शराबे की बात और है
दौर-ए-जश्न में शामिल जनाजों की बात है

दुआ करे कोई

अब तो बस हिम्मत की बात है, दुआ करे कोई
करिश्मा बेशक जादूगर जो अब हुआ करे कोई
है तंगदस्ती ऐसे में कैसे परफूल हुआ करे कोई
मुफलिसी सही खैरात का ख्वाब हुआ करे कोई
चार दिन की चाँदनी रात का मुसाफिर हुआ करे कोई
जिंदगी चौराहे पर अब चार आप्शन हुआ करे कोई

औजार भी हथियार हुआ करता है

ये किसके दम से तेरा कारोबार चला करता है
सियासत में औजार भी हथियार हुआ करता है

मुफलिसी का मसीहा तो बस वही हुआ करता है
गर्दिश में खुद का जिस्म भी बोझ हुआ करता है

सरहद पर सवाल कि कैसे ये हाल हुआ करता है
लड़ते हैं सही जो दिल उनका भी हुआ करता है

लगती नहीं पाबंदी


कभी जो लबों को बोलने की नहीं होती आजादी
मगर आँखों की हलचल पर, लगती नहीं पाबंदी

बेकरारी न दिखे आँखों की होती नहीं जमाबंदी
सूरज के बिना खिलती नहीं दीये की खुदाबंदी

रोशनी का हुनर है जो होती नहीं उसकी किलाबंदी
राजनीति की है जरूरत मगर है ये चीज बहुत गंदी

अदब में रोड़ा बहुत बचने में इन से नहीं अक्लमंदी
सरहद पर शैतान, जरूरी है हद के अंदर भी लामबंदी

किस तरह से कौम की तौहीन करती है खेमाबंदी
इतराइये जरूर हर भेद खोल के रख देगी लेखाबंदी

आँखों में आँसू हैं सही सपनों की होती नहीं जलबंदी
इसरार महबूब की और कायदे की अपनी समाजबंदी

अब, मैं तो क्या सुनेगा मेरा मरा बाप

मैं तो क्या, सुनेगा मेरा मरा बाप!
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आप उस को जानते हैं?
वह कविता लिखता है
हिंदी में!

नहीं, मैं नहीं जानता! क्यों?

वह अच्छा लिखता है, हिंदी में!

अच्छा, वह लिखता है! हिंदी में!
क्या खाक लिखता है?
बकवास!

लेकिन,
आप तो उसे जानते नहीं हैं!

छोड़िये,
हिंदी में जानना राजनीतिक पद है।
आप मेरी कविता सुनिये!

जी।

मेरा दुख है भरा तबादला।
आया था कल आज चला।

जी मैं मैं नीर भरी....

छोड़िये, ये मैं मैं.!
हिंदी में न सुनना राष्ट्र द्रोह है!
अब! सुनेंगे आप!

अब मैं तो क्या,
सुनेगा मेरा मरा बाप!

आप भले आदमी हैं!
आगे सुनिये, सुनते जाइये! कैसा!

बाकी तो जो है हाँहाँहा हेंहेंहें

बाकी तो जो है हाँहाँहा हेंहेंहें
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जी सर, जी सर
समझ गया सच ही जीतता है।

झूठ बोले बिना काम नहीं चलता
यह सच है जो जीतता है।

झूठ बोले बिना
काम नहीं चलता, सच है
इस तरह झूठ बोलना
एक बड़ा काम होता है सर

सच है सर, सच जीतता है
समझ गया समझ गया
बाकी तो जो है हाँहाँहा हेंहेंहें

स्वप्न संघर्ष और संवाद

सोचता हूँ आदमी किसी के साथ होने के एहसास मात्र से कितने रोमांच से भर जाता है। जीवन के प्रति हमेशा सकारात्मक रुख बनाये रखना चाहिए। संघर्ष से स्वप्न का संवादी रिश्ता हमेशा बनाये रखना चाहिए। एक दिन सपने सच होते होंगे, यह एहसास सपनों को लाल गुलाब में बदल देता है और संघर्ष को आसान। मखमली एहसास कि कोई है हमारे साँसों में बसा हुआ। प्रकृति भी अद्भुत है।
प्राकृतिक संबंध यानी वह संबंध जो प्रकृति से अनुमोदित है जैसे कमल पानी में ही होता है और गुलाब जमीन पर। जैसे चाँद आसमान में ही होता है और सागर जमीन पर। जैसे जैसे......

जिंदगी को हर पल जीना होता है। संघर्ष और कर्तव्यबोध से भरी हुई जिंदगी हमेशा सक्रिय प्रेरणा हैं। कई बार आदमी अपने अनजाने भी ऐसा कुछ कर जाता है जिसके दूसरे के लिए महत्त्व का पता उसे खुद भी नहीं होता है। जब पीछे मुड़कर, थोड़ा ठहर कर सोचता है तो कभी-कभी खुद भी अचरज से भर जाता है कि यह मैंने किया है। हाँ यह मुड़ना, थोड़ा ठहरना, थोड़ा सोचना थोड़े मुश्किल से होता है।
जिंदगी को अपने तरह से जीना चाहिए। संवाद जरूरी है उससे जिससे हम अपना सुख-दुख बाँट सकें। छोटी-छोटी खुशियाँ जिंदगी को मनोरम बनाती हैं।
छोटे-छोटे दुख जीवन को दुर्भर बना देते हैं। मैं जानता हूँ कि दिल में उमंग हो, भाव हों तो पेड़-पौधे, फूल-पत्ती, पूरबा-पछबा, सूरज-चाँद, रंग-पाखी सभी संवाद करने लगते हैं आपस में और हमारे संवाद के सहयोगी, संवाहक बनते हैं। याद है वो दिन जब हम मेघ से अपना मन कहते थे और मेघ तुम से मेरा ... हम से हमारा मन कहता था गरज-बरसकर... हम चाँद से कुछ कहते थे और चाँद आधी बात कहकर बादलों में छुपकर हमें सताता था.. बहुत मनुहार के बाद सामने आता था... बहुत मनाने पर पूरी बात बताता था... हवा का एक झोंका आता था और मन को सँवार जाता था... और बरखा रानी दूब को हरियाने के पहले हमारे मन को हरित-क्रांति की संभावनाओं से भर देती थी... याद है कैसे सारी-सारी रात तारों से हम बतियाते थे ... उनकी बातें गुप-चुप सुन लेते थे... और तारे कभी-कभी तो हम पर टूट भी पड़ते थे... आज मगर थोड़ा कठिन हो गया है... दिल के उमंग को इन सबसे जोड़े रखना.. मगर असंभव नहीं यह आज भी...तब हमारे पास नेट और फेस बुक नहीं था... अब तो यह भी है... संवाद का नया साधन...

इमदाद के बराबर

ये तेरी मुस्कान! रहने दे, है बस इमदाद के बराबर

मुहब्बत कोई क्या खाक करेगा फसाद के बराबर
वो बात भी करता नहीं दिल-ए-आजाद के बराबर

कह दिया और कह नहीं सकता उस्ताद के बराबर
ये तेरी मुस्कान! रहने दे, है बस इमदाद के बराबर

और थे, जिनके लिए इंक्लाब जिंदाबाद के बराबर
न कुँवर सिंह कोई, न जिला, शाहाबाद के बराबर

है जंग ही है मुराद तो लानत है मुर्दाबाद के बराबर
ये तेरी मुस्कान! रहने दे, है बस इमदाद के बराबर

कुटेव ही तो है.!

कुटेव ही तो है
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एक खूबसूरत ख्याल का पीछा करते हुए
मैं एक नदी के पास गया,
हाँ नदी ही तो थी
जिसे मैं औरत में
बदलना चाहता था
पर्यावरण कानून में इजाजत नहीं है
यह मुमकिन नहीं हुआ

अच्छा है कि मुमकिन नहीं है
औरत को आग में
या नदी को औरत में

बदलना; बदलाव
जनादेश का
जनादेश को खूबसूरत ख्याल में
बदलने की इजाजत नहीं देता

क्या गजब बदलाव की सहूलियत मिलते ही घोषणापत्र बदल दिया!

खूबसूरत ख्याल का पीछा करना मेरा कुटेव है
कुटेव यह कि
अपनी इच्छा को
सब की इच्छा बताकर
बात को आगे बढ़ाना कुटेव ही तो है

भारतीय साम्यवाद का भविष्य

भारतीय साम्यवाद का भविष्य

0 साम्यवादी विचारधारा के भारत के साथ संबंधों को आप किस तरह व्याख्यायित करते हैं? विस्तार से बताएं?

जिस विशिष्ट वैचारिक अर्थ में हम साम्यवादी विचारधारा को ग्रहण करते हैं उसका संबंध पाश्चात्य दार्शनिक परंपरा के विकास से है। संक्षेप में कहें तो जो कांट हीगेल आदि से होते हुए मार्क्स तक पहुँचकर अपना आकार पा लेता है। इससे इतर भारत में समतामूलक या कहें तो समताकांक्षी मनोभावना रही है। इस समताकांक्षी मनोभावना का साम्यवादी विचारधारा से सहमिलानी संबंध स्थापित होना था। लेकिन यहाँ एक गड़बड़ी हुई। गड़बड़ी यह कि, कम-से-कम शुरुआती दौर में, साम्यवादी विचारधारा के आग्रही लोगों ने जाने-अनजाने न सिर्फ भारत की इस समताकांक्षी मनोभावना की, न सिर्फ उपेक्षा की, बल्कि जानबूझकर अवहेलना भी की। मैं सोचता हूँ कि आखिर ऐसा क्यों हुआ! तो जो कुछ बातें समझ में आती हैं उनकी ओर इशारा मैं करना चाहता हूँ। समताकांक्षी मनोभावना की जो परंपरा हम भारत में देखते हैं उसका नाभि-नाल संबंध उन समूहों से रहा है जिनको असमान बनाने का काम बाह्मणवाद, आपत्ति हो तो कह लें वर्णवाद, ने किया। साम्यवादी विचारधारा के आग्रही लोगों में से अधिकतर उच्चवर्ण से आते थे  और वे इस समताकांक्षी भावना या चेतना के मुख्य स्वर को पहचान नहीं पाते थे, या पहचान नहीं सकते थे। मेरा इशारा खासकर साम्यवादी विचारधारा के आग्रही लोगों में, आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक एवं धार्मिक आधार पर, दलितों की अनुपस्थिति से है और उससे भी कहीं अधिक इस अनुपस्थिति को दूर करने के प्रति उदासीनता से है। दूसरी बात यह कि साम्यवादी विचारधारा के राजनीतिक उपकरण में बदलकर महत्त्वपूर्ण हो जाने का संबंध औद्योगीकरण की प्रक्रिया से रहा है। यह दुनिया के मजदूरों और सर्वहारा की बात करता रहा है। सर्वहारा का अर्थ उस व्यक्ति से नहीं है जो अपना सब कुछ हार या खो चुका है। बल्कि उन लोगों से है जो भूमिदास की अवस्था से मुक्त हो चुके हैं और जिनके पास अर्थोपार्जन के लिए व्यक्तिगत हुनर के अलावा कुछ नहीं होता है। हुनर का होना अपने आप में ही बड़ी बात है। इस अर्थ में देखें तो सर्वहारा न दीन होता है और न हीन होता है। भारत में सर्वहारा की छवि दीन, हीन ही नहीं बल्कि मलीन की भी बनी रही और इस छवि को बदलने का उपाय तो नहीं किया गया, बल्कि उलटे इस छवि को ही ‘महिमा मंडित’ ही किया गया या होने दिया गया।

मजदूर औद्योगीकीकरण की प्रक्रिया में अस्तित्व में आये। खेतिहर व्यवस्था में लगे लोग लोगों को पारंपरिक रूप से मजदूर नहीं जन या जोन कहा जाता रहा है। मजदूर और जन या जोन में एक बारीक अंतर की और ध्यान दिलाना लाजिमी है। जल या जोन उत्पादन के साथ ही उत्पाद में भी भागीदार थे। मजदूर उत्पादन की प्रक्रिया में तो भागीदार होते हैं लेकिन उत्पाद के भागीदार नहीं होते, अधिकतर मामलों में सीधे भोक्ता भी नहीं होते। जो हो, भूमि संबद्धता को भूमिदास मानने का भी बड़ा असर हुआ। ध्यान में रखना चाहिए कि संबद्धता सिर्फ स्वामित्व की स्थिति से तय नहीं होती है। भारत में असमानता एक सामाजिक सवाल भी था, आर्थिक सवाल भी था और जनतंत्रात्मक व्यवस्था में यह गहन राजनीतिक सवाल के साथ ही सांस्कृतिक सवाल बनकर भी उभरा। और यह बहुत जटिल स्थिति है। जटिल इसलिए कि ऊपर से सामाजिक दिखनेवाला सवाल अपने मूल रूप में धार्मिक कट्टरताओं से जुड़ा था और यह धार्मिक कट्टरता असल में उतना धार्मिक नहीं है जितना पुरोहितवादी है। पुरोहितवाद किसी एक जाति के ही रोजगार से जुड़ा नहीं था। समाज में विभिन्न जातियों की जजमनिका का अस्तित्व रहा है। विडंबना यह कि यह पुरोहितवाद किसी एक जाति या समुदाय से ही जोड़कर देखा-समझा गया। पुरोहितवाद जाति की सेवा नहीं करता, बल्कि यह राज की सेवा करता रहा है। आज चुनावों के माध्यम से राजसत्ता पर दखल जमाने के चक्कर में पड़े लगभग सभी राजनीतिक दल इस पुरोहितवाद का सेवन कर रहे हैं। जातिवाद पर आधारित कोई भी प्रक्रिया पुरोहितवाद का सेवन करने के लिए बाध्य है। लेकिन पुरोहितवाद या ब्राह्मणवाद को किसी एक जाति या समुदाय की सेवा से जोड़कर देखने के कारण यह साम्यवादी विचारधारा के आग्रही लोगों अपनी वास्तविक व्याप्ति की तुलना में बहुत छोटा दिखकर छलता रहा। अधिक कड़ाई से कहूँ तो इस छल में साम्यवादी विचारधारा के आग्रही लोग शरणागत होते रहे।

भारत मूलतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के सामंती अवशिष्टों और वह भी निकृष्ट अवशिष्टों के चंगुल में फँसा रहा और अधिकतम रियायत के साथ भी कहूँ तो, साम्यवादी विचारधारा के आग्रही लोग उत्तर-औद्योगिक पूँजीवादी के अप्रकट क्रूर चेहरे का भय दिखाकर उससे मुक्तिदाता के रूप में अपने होने को विश्वसनीय बनाने के निर्दोष उपाय में लगे रहे। हुआ यह कि तत्काल जो सता रहा है उससे मुक्ति की बात न कर अप्रकट भय की बात करनेवाले लोगों पर स्वाभाविक रूप से जनता ने विश्वास नहीं किया। खुद मार्क्स के चिंतन के हवाले से भी समझा जा सकता है कि साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना की शुरुआत सघन औद्योगिक वातावरण में ही हो सकता है। जहाँ सघन औद्योगिक वातावरण नहीं है वहाँ यह स्थानीय विशिष्टताओं के अनुसार अपना रूप बदलकर आगे बढ़ सकता है। उदाहरण, चीन और रूस का है, मार्क्सवाद और माओवाद, मार्क्सवाद और लेनिनवाद। कुल जमा यह कि भारत में साम्यवादी दर्शन का समताकांक्षी सामाजिक मनोभावना की आकांक्षाओं में निहित स्थानीय विशिष्टताओं के साथ संयोग विकसित न हो सका।  

0 साम्यवादी दर्शन का जब से भारत के चिंतन और निजी-सार्वजनिक जीवन में प्रवेश हुआ है, तब से लेकर अब तक आप उसकी भूमिका और योगदान को किस प्रकार आंकते हैं?

साम्यवादी दर्शन जीवन की किसी एक चर्या का नहीं, बल्कि एक तरह से कहें तो समग्र जीवन दर्शन और सभ्यता के मानवीय होने की अनिवार्य भौतिक शर्त्त है।  एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है। मनुष्य के सामाजिक जीवन का आधार है परिवार। परिवार में संसाधनों और आर्थिक भागीदारी के लिए जिस सिद्धांत को अपनाया जाता है, वह निश्चित रूप से साम्यवादी सिद्धांत है। परिवार के सभी सदस्य अपनी योग्यता के अनुसार देते हैं और जरूरत के अनुसार लेते हैं। योग्यता के अनुसार देने और जरूरत के अनुसार लेने की स्थिति के टूटते ही परिवार टूटकर बिखर जाता है। लेकिन भारत के चिंतन और निजी-सार्वजनिक जीवन में यह सिर्फ वर्ग चेतना या बोध के रूप में ही लागू हो सका वह भी आधा अधूरा।

0 हमारे राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक जीवन और मूल्य को साम्यवादी विचारधारा में कितना प्रभावित किया है?

साम्यवादी दर्शन का समताकांक्षी सामाजिक मनोभावना की आकांक्षाओं में निहित स्थानीय विशिष्टताओं के साथ संयोग विकसित न हो सकने के कारण साम्यवादी विचारधारा जीवन मूल्य के रूप में विकसित न हो सका। हाँ, औद्योगिक क्षेत्र में और खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में पूँजी और मजूरी के संबंधों को इसने प्रभावित किया। इस प्रभाव का सकारात्मक असर अन्यत्र भी पड़ा। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि अंततः यह सकारात्मक असर जीवन मूल्य का विकास न कर नये किस्म के लालच को ही हमारे चरित्र का हिस्सा बना दिया।

0 क्या भारत के परंपरागत सिद्धांतों, मूल्यों और दृष्टिकोण ने भारतीय साम्यवाद को भी प्रभावित किया है?

नहीं। राजनीतिक और दलीय गतिविधियों के बाहर, मुझे नहीं लगता कि साम्यवाद का कोई भारतीय संस्करण या विलक्षण प्रस्ताव तैयार हो पाया। यह एक सचाई है और इससे मुँह चुराना आत्मघाती है। बुनियादी तौर पर इस बात को समझते थे। समझते थे इसलिए भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी और भारत की कम्युनिष्ट पार्टी के अंतर को वे भरत सके। लेकिन, इस बरताव का कोई कारगर असर नहीं हुआ।

0 भारतीय साम्यवाद का मुख्य संघर्ष भारत में किन विचार-तत्वों, मूल्यों और परंपराओं से हुआ है?

भारतीय साम्यवाद जैसी किसी बात की कोई संकल्पना मेरे विचार में है नहीं। हाँ, भारत में साम्यवाद के प्रसार और स्वीकार में जातिवाद सहित पुरोहितवाद के सभी संस्करणों और ग्रामीण सामंती मिज़ाज में निहित आंतरिक औपनिवेशिक प्रसंगों से उत्पन्न यथार्थ मुख्य अवरोधक रहा है। भारत की राजनीतिक आजादी के आंदोलन का उत्ताप के प्रभाव में डूबा भारत का सक्रिय मन ऐसी किसी भी बात को मानने से प्रभावकारी ढंग से हिचक जाता था जिसमें औपनिवेशिक दासता का जरा भी आभास हो। राजनीतिक रूप से बहुत ही भोथड़े ढंग से इसे लागू करने की कोशिश की गई, खासकर 15 अगस्त 1947 के बाद। यह राजनीतिक भोथड़ापन का ही नतीजा था कि साम्यवाद को गाँधीवादी जीवन शैली के विकल्प या विस्तार के रूप में न पेश कर उसके विरुद्ध पेश किया गया या पेश होने दिया गया।

0 ऐसा समझा जाता है कि भारत के लिए गांधी-दर्शन और साम्यवादी चिंतन दो विपरीत ध्रुव हैं, जिन दोनों के बीच भारतीय जनमानस उलझकर रह जाता है। क्या आप इन दोनों विचारों के बीच कोई ऐसी समानता देखते हैं जो हमारे लिए व्यवहारिक हो?

गांधी-दर्शन और साम्यवादी चिंतन दो विपरीत ध्रुव नहीं हैं। गांधी-दर्शन और साम्यवादी चिंतन में दिशा और आकांक्षा की समानता है और कार्य प्रणाली में अंतर है। कार्य प्रणाली में अंतर पर की जानेवाली बहस ने ऐतिहासिक रूप से दिशा और आकांक्षा की समानता को बहुत मलीन और धुँधला बना दिया, इतना ही नहीं दोनों ने एक दूसरे को मजबूत बनाने के बदले कमजोर किया और अविश्वसनीय ही बनाया।

0 भारतीय समाज और यहां की राजनैतिक-लोकतांत्रिक व्यवस्था मूलत: मध्यमार्गी समझी जाती है। ऐसे में आप साम्यवादी दर्शन की हमारे देश में सैद्धांतिक व व्यवहारिक सफलता के प्रति आश्वस्त हैं या आप उसकी कामयाबी को संदिग्ध मानते हैं?

साम्यवादी चेतना की बिखरी हुई अंतर्वस्तु के प्रभावकारी बनते जाने के प्रति मैं आश्वस्त हूँ लेकिन इस साम्यवादी चेतना की बिखरी हुई अंतर्वस्तु को सहेजनेवाले, इस में तारतम्य विकसित करनेवाले राजनीतिक सांस्कृतिक ढाँचा का अभाव मुझे गहरी शंका में डाल देता है।       

0 एक बुद्धिजीवी के रूप में आप साम्यवादी दर्शन को किस प्रकार से व्याख्यायित करते हैं?

पहले कह चुका हूँ, साम्यवादी दर्शन जीवन की किसी एक चर्या का नहीं, बल्कि एक तरह से कहें तो समग्र जीवन दर्शन और सभ्यता के मानवीय होने की अनिवार्य भौतिक शर्त्त है।

0 इस दर्शन ने विश्व के साहित्यिक-कलागत-सांस्कृतिक जगत को किस प्रकार प्रभावित किया? भारत के संदर्भ में अगर चर्चा की जाए तो साम्यवाद हमारे सांस्कृतिक पहलुओं को किस प्रकार प्रभावित करता है? कला, साहित्य और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से वे कौन से तत्व हैं, जिनके कारण हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इस चिंतन से जुड़ता है?

जीवन दर्शन और सभ्यता के मानवीय होने की अनिवार्य भौतिक शर्त्त को सामाजिक सांस्कृतिक आधार पर स्वीकार्य और ग्राह्य बनाने के संदर्भ में साम्यवादी दर्शन ने विश्व के साहित्यिक-कलागत-सांस्कृतिक जगत को निश्चित ही प्रभावित किया है।

0 वैचारिक स्तर पर साम्यवादी विचारधारा ने बुद्धिजीवियों, लेखकों, नाटककारों को बहुत प्रभावित किया है। प्रगतिशील लेखक संगठन, इप्टा जैसी संस्थाओं से जुड़े लोगों ने अपने- अपने स्तर पर समाज प्रबोधन का काम किया है। वर्तमान में आप उनकी स्थिति, भूमिका और योगदान को किस प्रकार देखते हैं?

यह सच है कि शुरुआती दौर में लेखकों और संस्कृति कर्मियों को थोड़ा बहुत महत्त्व मिला। लेकिन बाद के दिनों में यह महत्त्व छीजता चला गया। साम्यवादी विचारधारा से जुड़े राजनीतिक लोगों ने बुद्धिजीवियों, लेखकों, नाटककारों के महत्त्व को न सिर्फ भुला दिया बल्कि उन्हें अपना पिछलग्गू बना दिया। उदाहरण के लिए, शुरुआती दौर में उस समय के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण लोगों ने प्रगतिशील लेखक संघ के घोषणापत्र को पढ़ा समझा उस पर चर्चा की और सहमति में हस्ताक्षर भी किया। बाद में दृष्टि की इस व्यापकता में खतरनाक सिकुड़न आती गई। यह कैसे हुआ, इस पर बहुत सारी बातें हैं। उदाहरण  के तौर पर एक प्रसंग। प्रगतिशील लेखक संघ से जैनेंद्र का भी जुड़ाव था। वस्तुतः रचनाशीलताएँ परस्पर भिन्न होती हैं विपरीत नहीं। यह सच है कि प्रेमचंद और जैनेंद्र की रचनाशीलता में अंतर है, लेकिन ये परस्पर विरोधी रचनाशीलता नहीं है। फिर भी बाद में जैनेंद्र की रचनाशीलता को विरोधी माना गया। साम्यवादी विचारधारा से जुड़े राजनीतिक लोगों का साहित्य आदि से कैसा जुड़ाव है, मुझे नहीं मालूम। वे पढ़ते भी नहीं हैं। पढ़ते भी हैं, मुझे इसमें पूरा संदेह है, तो स्थापित और चर्चित को ही। बहुत चर्चा करना यहाँ, संभव भी नहीं है और जरूरी भी लेकिन यह कहना जरूरी है कि साहित्य और संस्कृति कर्म राजनीतिकों का उपनिवेश नहीं है। लेकिन साहित्य और संस्कृति कर्म को संगठनों और मंचों के माध्यम से राजनीतिकों का उपनिवेश ही बनाने की आत्मघाती कोशिश की। हाँ, अगर किसी अन्य कारण से साहित्य और संस्कृति कर्म में लगे लोग चर्चा में आ जाते हैं, अक्सर असहमतों और विरोधियों की गतिविधियों या कार्रवाइयों के कारण, तो जरूर ये भी उसकी तरफ बढ़ते हैं। कन्हैया प्रकरण में और भी कई मामले हैं, विचार के कई प्रसंग और स्तर हैं, फिर भी साम्यवादी विचारधारा से जुड़े राजनीतिक लोगों के इस संदर्भ में किये गये व्यवहार को याद किया जा सकता है। खैर छोटा मुँह, बड़ी बात।

0 क्या देश के पुनर्जागरण और आधुनिकता पर आप साम्यवाद का प्रभाव देखते हैं? इसे जरा विस्तार से बताएं!

पता नहीं पुनर्जागरण से क्या आशय है। पुनर्जागरण और नवजागरण में अंतर है। आधुनिकता और आधुनिकतावाद में भी अंतर है। ऐतिहासिक द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की बात को ध्यान में रखें तो ऐतिहासिक रूप से बहुत सारी प्रवृत्तियाँ एक साथ जारी रहती हैं एक दूसरे को द्वंद्वात्मक गति में डालती हैं और प्रभावित करती हैं। यह एकतरफा या सिर्फ दो तरफ नहीं, बहुतरफा होता है। एक दूसरे के ऊपर पड़नेवाले इन के पारस्परिक प्रभावों को कार्य-कारण सिद्धांत की दृष्टि से नहीं, बल्कि वाद-विवाद-संवाद की गतिमान प्रक्रिया के नजरिया से समझा जा सकता है।

अंत में, यह कि मैं यह साफ कर दूँ कि इतने महत्त्वपूर्ण सवालों का जवाब देने के लिए मैं बहुत उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूँ। मेरा अनुभव भी बहुत-बहुत ही सीमित है और ज्ञान भी। मैं दर्शन से जुड़े संदर्भों में अपनी राय तो रख सकता हूँ लेकिन दल से जुड़े सवालों का जबाव देना न तो मेरे लिए मुमकिन है और न जरूरी। इसे इसी रूप में ग्रहण किये जाने का अनुरोध है।